Please scroll down for English and Sanskrit versions. Thanks a lot to my Mother Mrs Sushma Srivastava for the guidance provided by her in translation to Sanskrit.
शाम ढल रही थी। दिल्ली के एक शांत क्लब के लॉन में, पैंतीस साल पहले कॉलेज के दिनों में एक साथ सपने देखने वाले चार पुराने मित्र—जो अब 65 वर्ष के हो चुके थे—चाय की प्यालियों के साथ बैठे थे। आज वे जीवन के उस पड़ाव पर थे जहाँ मुड़कर देखने पर हिसाब लगाना स्वाभाविक था—क्या खोया और क्या पाया?
दिलचस्प बात यह थी कि इन चारों ने अपनी ज़िंदगी और करियर की शुरुआत तो एक साथ की थी, लेकिन उनके रास्ते और जीवन के उसूल बिल्कुल जुदा थे।
विकास: वैश्विक कॉर्पोरेट घुमक्कड़: विकास का उसूल शुरू से बिल्कुल साफ था—”मैं वहाँ जाऊँगा जहाँ मेरी कॉर्पोरेट तरक्की और वैश्विक अवसर मुझे ले जाएंगे।” विकास ने चाय का घूंट भरते हुए कहा, “यार, मैंने सीमाओं को कभी आड़े नहीं आने दिया। दिल्ली से लंदन, लंदन से टोक्यो, और टोक्यो से न्यूयॉर्क… कॉर्पोरेट सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते मैं एक बहुराष्ट्रीय कंपनी (MNC) का वाइस प्रेसिडेंट बन गया। बैंक खाते में करोड़ों हैं, दुनिया का हर कोना देखा है।”
लेकिन तभी उसकी आवाज़ में एक गहरी खामोश उदासी घुल गई, “पर सच कहूँ, इसका असली मोल अब समझ आता है। मेरे पास शोहरत है, पर मेरा घर खाली रहता है। पत्नी के जाने के बाद, विदेश में बसा मेरा बेटा साल में एक या दो बार वीडियो कॉल कर पाता है। जब पिछले साल मेरी हार्ट सर्जरी हुई थी, तो अस्पताल के उस ठंडे कमरे में मेरे साथ सिर्फ नर्स थी। मैंने दुनिया जीती, पर अपनों को पीछे छोड़ आया।”
सुरेश: स्थानीय निजी क्षेत्र का पेशेवर: सुरेश ने मुस्कुराकर विकास का कंधा थपथपाया। उसका उसूल इसके विपरीत था—”मैं हर हाल में अपने शहर में टिक कर रहूँगा, बिना किसी बार-बार की शिफ्टिंग के।” सुरेश ने कहा, “विकास, जब तुम समंदर पार के महानगरों और एयरपोर्ट्स के बीच दौड़ रहे थे, तब मैंने अपने शहर की एक स्थिर निजी कंपनी में नौकरी चुन ली। मैंने पैंतीस साल एक ही शहर में बिताए।”
उसकी आँखों में संतोष था, “मैंने क्या खोया? शायद वो बड़े-बड़े विदेशी दौरे और फॉर्च्यून-500 कंपनियों के पद। पर मैंने जो पाया, उसकी कोई कीमत नहीं है। रोज़ शाम को परिवार के साथ बैठना, पुराने दोस्तों का हर रविवार का साथ, और मोहल्ले का हर सुख-दुख साझा करना—यही मेरी असली जमापूँजी है।”
राघव: अखिल भारतीय केंद्रीय सेवा अधिकारी: राघव ने अपनी डायरी बंद करते हुए बातचीत में हिस्सा लिया। उसका उसूल था—”मैं वहाँ जाऊँगा जहाँ सेंट्रल सर्विस की पोस्टिंग और ट्रांसफर मुझे देश के किसी भी कोने में ले जाएं।”
राघव ने कहा, “मैंने केंद्रीय सेवा (कस्टम्स और सेंट्रल एक्साइज) में रहते हुए देश के हर बड़े बंदरगाह, मुंबई पोर्ट से लेकर चेन्नई और कोलकाता तक, और अंत में दिल्ली हेडक्वार्टर तक का सफर तय किया। एक प्रमुख कमिश्नर के रूप में रिटायर होना मेरे करियर का शिखर था। भारत की अर्थव्यवस्था को अंदर से देखने का अनुभव अद्भुत रहा।”
फिर उसने थोड़ा रुककर कहा, “मगर इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। मेरी पत्नी हर तीन साल में नया आशियाना बसाने से थक गई। मेरे बच्चे पांच अलग-अलग स्कूलों में पढ़े, जिनका कोई स्थायी मित्र नहीं बन पाया। मैं देश की व्यवस्था संभालता रहा, पर अपने परिवार को समेट कर नहीं रख पाया।”
सोहन: क्षेत्रीय स्थिरता और जड़ों का आशियाना: सोहन ने मुस्कुराते हुए कहा, “और मेरा उसूल बिल्कुल सरल था—’मैं हर कीमत पर अपने गृह राज्य और क्षेत्रीय कार्यालय में टिक कर रहूँगा, चाहे तरक्की की रफ्तार थोड़ी धीमी क्यों न हो।'”
सोहन ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा, “राघव, जब तुम देश भर के बंदरगाहों और महानगरों के बीच दौड़ रहे थे, तब मैंने जानबूझकर ऐसे विकल्प चुने जिससे मैं अपने बूढ़े माता-पिता के पास और अपने शहर के रीजनल ऑफिस में रह सकूँ। मेरे बच्चे उसी पुराने घर में बड़े हुए जहाँ उनके दादा-दादी थे। हमारे मोहल्ले के लोग और पारिवारिक ताना-बाना हर पल मेरे साथ रहा। जब पिछले साल मेरी तबियत बिगड़ी, तो मेरे अपने घर के ड्राइंग रूम में अपनों का तांता लगा था।” एक संतोषजनक अंत
चारों मित्रों ने कुछ पल सोचकर एक-दूसरे को देखा। विकास ने वैश्विक ऊँचाइयों को छुआ था, सुरेश ने स्थानीय स्थिरता को थामा था, राघव ने देश भर में प्रशासनिक अनुभव बटोरा था, और सोहन ने जड़ों की मजबूती को प्राथमिकता दी थी।
जिंदगी के इस आखिरी पड़ाव पर आकर चारों को समझ आ गया था कि रास्ते भले ही कितने भी अलग हों, लेकिन सार यही है—”जेहि विधि राखे राम तहि विधि रहिए”। चाहे नौकरी तुम्हें सात समंदर पार ले जाए, देश भर में घुमाए, एक ही शहर में रोके रखे या क्षेत्रीय कार्यालय में रखे; जो जहाँ है, अगर वह अपने दिल से संतुष्ट है, तो वही जीवन की सबसे बड़ी सफलता है।
हल बहुत सीधा है मित्रों—
“जेहि विधि राखे राम तेहि विधि रहिए
और साथ ही यह कभी मत भूलो कि—
“देख पराई चूपड़ी मत ललचाय जीव!”

Jehi Vidhi Rakhe Ram
Evening was falling. On a quiet club lawn in Delhi, four old friends who had dreamed together during college days 35 years ago—now 65 years old—were sitting with cups of tea. Today they were at that stage of life where looking back and taking stock—what was lost and what was gained—was natural.
Interestingly, these four had started their lives and careers together, but their paths and principles of life were entirely different.
Vikas: The Global Corporate Wanderer: Vikas’s principle was clear from the beginning—”I will go wherever my corporate growth and global opportunities take me.” Sipping his tea, Vikas said, “Friend, I never let boundaries stand in my way. From Delhi to London, London to Tokyo, and Tokyo to New York… climbing the corporate ladder, I became the Vice President of a multinational company (MNC). My bank account has crores, and I’ve seen every corner of the world.”
But then a deep, silent sadness crept into his voice, “As for the truth, I realize its real value now. I have fame, but my home remains empty. After my wife passed away, my son living abroad manages to make a video call only once or twice a year. When I had my heart surgery last year, there was only a nurse with me in that cold hospital room. I won the world, but left my loved ones behind.”
Suresh: The Local Private Sector Professional: Suresh smiled and patted Vikas’s shoulder. His principle was the exact opposite—”I will stay put in my city at all costs, without any frequent shifting.”
Suresh said, “Vikas, while you were running between overseas metropolises and airports, I chose a stable private job in my own city. I spent 35 years in the same city.”
There was contentment in his eyes, “What did I lose? Perhaps those big foreign tours and Fortune 500 company titles. But what I gained has no price. Sitting with family every evening, the company of old friends every Sunday, and sharing every joy and sorrow of the neighborhood—this is my true wealth.”
Raghav: The All-India Central Services Officer: Closing his diary, Raghav joined the conversation. His principle was—”I will go wherever Central Service postings and transfers take me, to any corner of the country.” Raghav said, “Working in the Central Services (Customs and Central Excise), I journeyed through every major port of the country—from Mumbai Port to Chennai and Kolkata, and finally to the Delhi headquarters. Retiring as a Principal Commissioner was the peak of my career. The experience of seeing India’s economy from the inside was amazing.”
Then stopping for a moment, he said, “But a heavy price had to be paid for this. My wife grew tired of setting up a new home every three years. My children studied in five different schools, and none of them could make a permanent friend. I kept running the country’s administration, but could not keep my own family together.”
Sohan: Regional Stability and the Abode of Roots: Sohan smiled and said, “And my principle was quite simple—’I will stay put in my home state and regional office at all costs, no matter how slow the pace of promotion.'” Sohan completed his thought, “Raghav, while you were racing across ports and metropolises nationwide, I deliberately chose options that allowed me to stay near my elderly parents and at the regional office in my city.
My children grew up in the same old house where their grandparents lived. The people of our neighborhood and our familial fabric stayed with me every moment. When my health deteriorated last year, my own living room was crowded with my loved ones.” A Satisfying Ending Perhaps.
The four friends thought for a few moments and looked at each other. Vikas had touched global heights, Suresh had held onto local stability, Raghav had gathered administrative experience across the country, and Sohan had prioritized the strength of his roots.
Coming to this final phase of life, all four understood that no matter how different the paths may be, the essence remains—”Jehi vidhi rakhe ram tehi vidhi rahiye” (Remain as Ram keeps you). Whether your job takes you across seven seas, makes you travel the whole country, keeps you in one city, or binds you to a regional office; wherever a person is, if they are content from within, that is the greatest success in life.
The solution is very simple, my friends—
“Jehi vidhi rakhe ram tehi vidhi rahiye!”
And never forget that—
“Dekh parayi chupri mat lalchay jeev!” (Do not let your soul lust after someone else’s apparent luxuries).

यथा रामः स्थापयति तथैव स्थातव्यम्
सायं प्रचलति स्म। देहली-नगरस्य एकस्मिन् शान्त-क्लब-प्राङ्गणे, पञ्चत्रिंशत् वर्षाणि पूर्वं महाविद्यालयस्य दिनेषु एकस्मिन् स्वप्नं दृष्टवन्तः चत्वारः वृद्धाः मित्राणि—ये अधुना पञ्चषष्टिवर्षाीयाः आसन्—चषकैः (चाय-चषकैः) सह उपविष्टाः आसन्। अधुना ते जीवनस्य तस्मिन् स्तब्धे आसन् यत्र पृष्ठतः पश्यन्तः लेखाजोखा कर्तुम् स्वाभाविकम् आसीत्—किं नष्टं किञ्च लब्धम्?
रोचकम् इदम् आसीत् यत् एते चत्वारः स्वजीवनस्य कार्यस्य च आरम्भम् एकत्रैव कृतवन्तः आसन्, परन्तु तेषां मार्गाः जीवनादर्श च सर्वथा भिन्नाः आसन्।
१. विकासः: वैश्विक-निगमक-भ्रमरः (Global Corporate Wanderer)
विकासस्य आदर्शः आरम्भाद् एव स्पष्टः आसीत्—”अहं तत्र गमिष्यामि यत्र मम निगमक-प्रगतिः वैश्विकावसराः च मां नेष्यन्ति।”
विकासः चाय-पानं कुर्वन् अवदत्, “मित्र, अहम् कभी मर्यादाः मम मार्गे न अवरोधितवान्। देहलीतः लण्डनम्, लण्डनतः टोकियो, टोकियोतः च न्यूयार्क… निगमक-सोपानानि आरोहन् अहम् एकस्य बहुराष्ट्रीय-निगमस्य (MNC) उप-अध्यक्षः (Vice President) जातः। बैंक-खाते कोट्यवधिः सन्ति, जगतः प्रत्येकं कोलं दृष्टवान् अस्मि।”
परन्तु तदैव तस्य स्वरे एका गाम्भीर्या शान्ता उदासी प्रविष्टा, “किन्तु सत्यं वदामि, अस्य वास्तविकं मूल्यम् अधुना ज्ञायते। मम पार्श्वे ख्यातिः अस्ति, परन्तु मम गृहं रिक्तं तिष्ठति। पत्न्याः मृत्योः अनन्तरम्, विदेशे स्थितः मम पुत्रः वर्षद्वये एकदा वा वीडियो-कॉल करोति। यदा गतवर्षे मम हृदयरोगस्य शल्यक्रिया अभवत्, तदा अस्पतालस्य तस्मिन् शीतले कक्ष्वे मया सह केवलं परिचारिका आसीत्। अहं विश्वं जितवान्, परन्तु अप्तान् पृष्ठतः त्यक्तवान्।”
२. सुरेशः: स्थानीय-निजी-क्षेत्रस्य व्यावसायिकः
सुरेशः प्रहस्य विकासस्य स्कन्धम् अताडयत्। तस्य आदर्शः तस्य विपरीतम् आसीत्—”अहं सर्वदा मम नगरे एव स्थातुं निश्चिन्वन् स्थास्यामि, न तु पुनरावृत्ति-स्थानांतरणेन।”
सुरेशः अवदत्, “विकास, यदा त्वं समुद्रपारस्य महानेत्राणां विमानपत्तनानां च मध्ये धावन् आसीत्, तदा अहम् मम नगरस्य एकस्मिन् स्थायिनि निजी-निगमे कार्यं चितवान्। अहम् पञ्चत्रिंशत् वर्षाणि एकस्मिन् एव नगरे व्यतीतवान्।”
तस्य नेत्राणि सन्तोषयुक्तानि आसन्, “मया किं नष्टम्? कदाचित् तानि विशालानि विदेश-भ्रमणानि फॉर्च्यून-५०० निगमानां पदानि च। परन्तु मया यत् लब्धम्, तस्य मूल्यं नास्ति। प्रतिदिनं सायं परिवारैः सह उपवेशनम्, पुरान-मित्राणां प्रतिरविवासरीयः साथः, तथा च प्रतिवेशस्य सुख-दुःखयोः सहभागिता—इयम् एव मम वास्तविकसम्पदा अस्ति।”
३. राघवः: अखिल-भारतीय-केन्द्रीय-सेवा-अधिकारी
राघवः स्वस्य डायरी पिधाय सम्भाषणे भागं गृहीतवान्। तस्य आदर्शः आसीत्—”अहं तत्र गमिष्यामि यत्र केन्द्रीय-सेवायाः पदानि स्थानांतरणञ्च मां देशस्य कस्मिन् अपि कोने नेष्यन्ति।”
राघवः अवदत्, “केन्द्रीय-सेवायाम् (Customs and Central Excise) स्थायित्वा अहं देशस्य सर्वेषां बृहद्-बंदरगाहानाम्—मुम्बई-बंदरगाहात् आरभ्य चेन्नई तथा कोलकाता पर्यन्तं, अन्ते च देहली-मुख्यालयं पर्यन्तं यात्रां कृतवान्। एकः प्रधान-आयुक्तः रूपेण निवृत्तः भवन् मम करियरस्य शिखरम् आसीत्। भारतस्य अर्थव्यवस्थायाम् आन्तरिक-दृष्ट्या अनुभूतिकरणम् अद्भुतम् आसीत्।”
ततः सः किञ्चित् स्थगयित्वा अवदत्, “परन्तु अस्य भारी मूल्यं दातव्यम् अभवत्। मम पत्नी त्रिषु वर्षेषु एकवारं नूतनम् आगारं निर्मिता थकिता अभवत्। मम बालकाः पञ्चसु भिन्नेषु विद्यालयेषु अधीतवन्तः, तेषां कोऽपि स्थायी मित्रः नाभवत्। अहं देशस्य व्यवस्थां चालितवान्, परन्तु स्वपरिवारं सम्यक् समेटितुम् न शक्नोमि स्म।”
४. सोहनः: क्षेत्रीय-स्थिरता तथा मूलानाम् आश्रयः
सोहनः प्रहस्य अवदत्, “मम आदर्शः सरलः एव आसीत्—’अहं प्रत्येकस्मिन् मूल्ये स्वगृहराज्ये क्षेत्रीयकार्यालये च स्थातुं निश्चिन्वन् स्थास्यामि, यद्यपि उन्नतेः गतिः मन्दा भवेत्।'”
सोहनः स्ववचनं समाप्य अवदत्, “राघव, यदा त्वं देशस्य बंदरगाहानां महानगरियाणां च मध्ये धावन् आसीत्, तदा अहम् स्वयमेव तानि विकल्पानि चितवान् येन अहं वृद्धयोः मातापित्रोः समीपम्, मम नगरस्य च क्षेत्रीय-कार्यालये स्थातुं शक्नुयाम्। मम बालकाः तस्मिन् एव पुरान-गृहे वर्धिताः यत्र तेषां पितामहाः आसन्। अस्माकं प्रतिवेशजनाः पारिवारिक-सम्बन्धाः च प्रत्येकक्षणं मया सह आसन्। यदा गतवर्षे मम स्वास्थ्यं क्षीणम् अभवत्, तदा मम गृहस्य आतिथ्य-कक्षे apnaनाम् समागमः आसीत्।”
संतुष्टिपूर्णः अन्तः
चत्वारः मित्राणि किञ्चित् विचिन्त्य परस्परं दृष्टवन्तः। विकासः वैश्विक-शिखराणि स्पृष्टवान् आसीत्, सुरेशः स्थानीय-स्थिरतां धारितवान् आसीत्, राघवः देशव्यापि प्रशासनिक-अनुभवं प्राप्तवान् आसीत्, तथा च सोहनः मूलानां दृढतां प्राथम्यं प्रदत्तवान् आसीत्।
जीवनस्य अस्य अन्तिम-चरणे आगत्य चतुर्णां मतिः आगता यत् मार्गाः कियन्तोऽपि भिन्नाः भवेयुः, परन्तु सारः एक एव अस्ति—”यथा रामः स्थापयति तथैव स्थातव्यम्” (जेहि विधि राखे राम तेहि विधि रहिए)। यत्र कोऽपि अस्ति, यदि सः स्वहृदयात् संतुष्टः अस्ति, तर्हि सः एव जीवनस्य महानतमः विजयः अस्ति।
समाधानं सरलं अस्ति मित्राणि—
“यथा रामः स्थापयति तथैव स्थातव्यम्!”
तथा च नैव विस्मरणीयम् यत्—
“परकीयाम् चूपरीम् (वृथा-सुखं) दृष्ट्वा जीवस्य लोभः मा भूत्!”
This short story is a work of fiction based on life experiences. AI assistance is acknowledged please.

very true and well written Sanjeev,this is real and true fact of life .what ever we propose to achieve during our career at last it is the internal satisfaction and family ,friends togetherness is the ultimate satisfaction which is needed at our laast stage of life .very well elaborated with clear thought of all four friends area . Finally it is as they realise at the end. well done, keep it up